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Wednesday, January 29, 2020

हे दुख भंजन रासबिहारी

      हे दुख भंजन रासबिहारी

                दास विपुल 

 

मां जग्दम्बे के नव रूप, दश विद्या, पूजन, स्तुति, भजन सहित पूर्ण साहित्य व अन्य

हे दुख भंजन रासबिहारी,  करूं मैं विनती देवा॥

राधारमण श्री हरिनारायण,  कृपा करो हे देवा॥ 

 

तुम हो नर नारायण प्रभुजी,  हो जग पालन हारी।

शरण तुम्हारी आन पड़े हैं,  राखो लाज हमारी॥ 

दया के सागर नाम तुम्हारा, हो देवों के देवा॥

राधारमण श्री हरिनारायण,  कृपा करो हे देवा॥


नंद के लाला रूप विशाला,  बंसी मधुर सुना दो।

भक्तजनों के मन मंदिर में,  प्रेमल दीप जला दो॥

धेनु चराई रास रचाकर,  बन गोपालक देवा॥

राधारमण श्री हरिनारायण,  कृपा करो हे देवा॥


मीरा की तानों में बसते, भक्त की आह सजते॥

सूर की भक्ति ज्ञान की धारा, हरि हर श्वास में बसते॥

चक्रसुदर्शन धारी प्रभु जी,  हो योगेश्वर देवा।

 राधारमण श्री हरिनारायण,  कृपा करो हे देवा॥

तीर्थ शिवोम् की धारा प्रभु जी, नित्यबोधानन्द तुम्ही।

आन बसो अब सांवरे उर में, दास विपुल ध्यान तुम्ही॥ 

जग आधीन तुम्हारे प्रभुवर, भक्त आधीन हो देवा॥

राधारमण श्री हरिनारायण,  कृपा करो हे देवा॥


वसंत पंचमी पर विशेष: माता शारदे

        वसंत पंचमी पर विशेष

                   माता शारदे

                   दास विपुल 

 

मां जग्दम्बे के नव रूप, दश विद्या, पूजन, स्तुति, भजन सहित पूर्ण साहित्य व अन्य

माता शारदे जग कल्याणी। रूद्र रूप धर कर रूद्राणी॥ 

वाग्देवी मां ज्ञान प्रदाता। सत्य शक्ति बन जग निरवाणी॥


रूप मनोहर मात शारदे। सहज बुद्धि दे शांति शारदे॥

पापी न पावे छवि तुम्हारी। शुद्ध सकल हो जन्म ब्रह्माणी॥


तुम सर्व जीव सृष्टि की कर्ता। ब्रह्म शक्ति बनो ब्रह्मा नियंता॥

सद्गुरू बुद्धि में निवास तू। शिवतत्व रूप प्रकट मुद्राणी॥


वाणी जग की वीणा निर्मित। हंस वाहन हो सोहं परिणित॥

पाप बुद्धि को तुम हर लेती। इन्द्र की शक्ति बनो इंद्राणी॥


दास विपुल मूरख खलकामी। लेश कृपा मिल बन कवि ज्ञानी॥

अश्रुपूरित दृग जल पग धोऊं।मुक्ति मिले कब जग निरमाणी॥


एक शाम हरकोर्टियन्स मित्रों के नाम

एक शाम हरकोर्टियन्स मित्रों के नाम 

विपुल सेन उर्फ लखनवी, वर्ष: 1982

पढ़ किताब नंबर बढ़ा डाला, बिंद मोतिया भी कर मानें।

आखिर में ऑप्रेशन करवाया, कुछ हरकोर्टियन्स मित्रों ने।।


नहीं काम तब ग्रुप को बनाया, पोस्ट ही लिखते रहते हैं।

अतुल्य समय को यूंहि गंवाया, कुछ हरकोर्टियन्स मित्रों ने।।


बीबी पर बस नहीं  चला जब, जूनियर को गरियाते हैं।

धौंस पट्टी को यूंही जमाया, कुछ हरकोर्टियन्स मित्रों ने।।


हरकोर्टियन्स को भूले बैठे, ऊंचा ओहदा पाकर के।

बाद रिटायरमेंट गीत सुनाया, कुछ हरकोर्टियन्स मित्रों ने।।


एच.बी.टी.आई. को भूल गये, सपने में आता होगा।

वहीं सम्मान अचीवमेंट पाया, कुछ हरकोर्टियन्स मित्रों ने।।


चाय पर चर्चा शुरू हुई और, खत्म हुई जो दारू पर।

दारू में पानी मिलवाया, कुछ हरर्कोटियन्स  मित्रों ने।।

 

शेरो शायरी तो शुरू हुई,  पर खत्म हुई मां बहनों पर।

दोस्ती का आयाम बनाया,  कुछ हरर्कोटियन्स  मित्रों ने।।


खाना अच्छा बना हुआ था, जमकर खाया सब लोगों ने।

टेबल पर रायता फैलाया,  कुछ हरर्कोटियन्स  मित्रों ने।।


विपुल तो चुपचाप था बैठा, नहीं था मेंबर किसी ग्रुप का।

मुंबई से उसको बुलवाया  कुछ हरर्कोटियन्स  मित्रों ने।।


बड़ी ऊंची स्टेज बनवाई, जाने फिर भी क्यों हूट हुए।

विपुल लखनवी को तुरन्त बुलाया, कुछ  हरकोर्टियन्स मित्रों ने।।


अपने भी क्या दिन थे यारों, मुर्गा मुर्गी बनकर खेले।

याद सुनाई आंखे भरकर,  कुछ  हरकोर्टियन्स मित्रों ने।।

                 😁😁😁😁😁😆😆👻👻🤓🤩😂🤣🤣

Tuesday, January 28, 2020

मत बनाओ प्रभु को पत्थर

मत बनाओ प्रभु को पत्थर

विपुल लखनवी। नवी मुंबई।


मां जग्दम्बे के नव रूप, दश विद्या, पूजन, स्तुति, भजन सहित पूर्ण साहित्य व अन्य

मत बनाओ प्रभु को पत्थर स्वयं ही मन देख लो।

रूप सारे उसके जग में हर एक रूप में देख लो॥

बात मानो ज्ञानीजन की सभी कणों में रहता है।

पाषाणों में ढूंढे रब को गुरुशक्ति में देख लो।

कैसी लीला प्रभु रचाई स्वयं बसे इंसान में।

किंतु जग न मिल सके तब स्वयं आत्मा में देख लो॥

आरती किसकी करे है भोग भी तेरा ही लगता।  

कस्तूरी मृग में है बसती ब्रह्म स्वयं में देख लो॥

तीर्थ शिवओम की कृपा से अब प्रभु नित्यबोध है।

आत्मा क्या मैं कहां हूं मैं में मैं को ही देख लो॥

दास विपुल दीन हीन है साधन नहीं कुछ कर रहा।

पूछ्ता ज्ञानीजनों से अरे साधना में देख लो॥



मीरा कहो या राधा मतलब तो एक है।

मीरा कहो या राधा मतलब तो एक है।

 विपुल लखनवी। नवी मुंबई।

 

मां जग्दम्बे के नव रूप, दश विद्या, पूजन, स्तुति, भजन सहित पूर्ण साहित्य व अन्य

मीरा कहो या राधा मतलब तो एक है।

कर लो प्रभु की भक्ति सारे जग में एक है॥

मीरा हरि दीवानी हरि को उसने पाया।  

राधा के केवल गिरधर दृष्टि तो एक है॥

मीरा हुई आनन्दित हरि की मधुर वंशी से।

राधा ने छीनी वंशी प्रेम भक्ति एक है॥

मीरा ने राज छोड़ा राधा बेसुध दीवानी।

भक्ति के रस में डूबी रस दोनों एक है॥

दोनों में जो अंतर न दुनिया देख पाये। । 

राधा हरि की शक्ति मीरा गोपी रूप है॥

हरि नाम का भजन ही मादक मधुर निराला।

भक्ति किसी की कर लो मादकता एक है॥

शिवोम् तीर्थ गुरुवर अंतर प्रकट है गिरधर।

नित्य बोधानन्द प्रभु जग की वह टेक है॥

नाम जप का अमृत सद्गुरु कृपा से पीन्हा।

पीकर विपुल मतवाला दिखे ब्रह्म एक है॥


Monday, January 27, 2020

सत्य नही मिट सकता है। मिथ्य नही टिक सकता है।।

 सत्य नही मिट सकता है। मिथ्य नही टिक सकता है।।

 

 विपुल लखनवी। नवी मुंबई।


सत्य नही मिट सकता है। मिथ्य नही टिक सकता है।।

श्रेष्ठ ज्ञान की नीति पाली। सत्य सनातन है वो डाली।।
चाहे कितने तूफ़ा आये। सत्य नहीं झुक सकता है।।


कितने दुष्ट धरा पर आये। चहुदिशा जो कष्ट  लाये।।
किंतु सत्य सनातन स्थिर। ध्वज नहीं झुक सकता है।।

 
चाहे जैसे हो अत्याचारी। सकल धरा जिनसे है हारी।।
खुद मिट जाते तेज देखकर। सहन नहीं हो सकता है।।

 
जैन बौध्द चाहे सिख ईसाई। सबने शिक्षा यहीं से पाई।।
आज भले हमको वो भूलें। लेख नही मिट सकता है।।

 
सकल विश्व के ज्ञानी ध्याये। सनातन की गंगा में नहाये।।
धर्म अलग कर ज्ञानी बनते। बीज लघु न गल सकता है।।

 
देवीदास विपुल की विनती। सकल सृष्टि जैसे हो सुनती।।
सत्य सनातन अमिट रहेगा। पापी नहीं टिक सकता है।।

 
सत्य नही मिट सकता है। मिथ्य नही टिक सकता है।।



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बियाबान बांगवा

बियाबान बांगवा

विपुल लखनवी। नवी मुंबई।


मेरा बांगवा हरा था बियाबान हो गया।
एक घर से न जाने कब मकान हो गया।।
गूंजती किलकारियां बच्चों के कहकहे।
एक जानदार बस्ती थी श्मशान हो गया।।

बाट जोहती रहती है अपनी आंखे अब।
देखते हुए दरवाजे एक थकान हो गया।।
चिठ्ठी नही मिलती कभी मोबाइल आफ है।
लाइन हर दम व्यस्त एक अजान हो गया।।

किसको सुनाऊं हालेगम अपना लखनवी।
आंखों में अश्क इतने मुस्कान हो गया।।
गांव छोड़ा कभी औलाद की खातिर।
उड़ गए परिंदे घोसला वीरान हो गया।।